एम एफ हुसैन: आम आदमी के बीच मे प्रख्यात कलाकार

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कला की दुनियां में कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाना हर एक की बात नहीं। कोई बिरला ही होता है। जो एक संघर्ष के साथ अपने जीवन की शुरुआत से अंत तक सिर्फ कला के लिए जीता है। इस बिरले कलाकार में एम एफ हुसैन भी आते हैं।

अस्थाना आर्ट फोरम के मंच पर आज हुसैन को याद किया गया। जिसमें उनके पोर्ट्रेट भी बनाये गए और कुछ कलाकारों अश्वनी प्रजापति, अनिल बोड़वाल, राजेश सिंह, धीरज यादव, सौम्या अस्थाना, कुछ छात्र अंशु शर्मा ( कक्षा 10 ), समिधा कुमार ( कक्षा 12) और अपने अनुभव भी साझा किए।

MF Husain
कलाकारों द्वारा हुसैन के बनायें गए पोर्ट्रेट

भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने हुसैन पर विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि एम.एफ. हुसैन का जन्म 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ था और 1940 के दशक में वह एक प्रसिद्ध कलाकार बन गए। 1947 में वह फ्रांसिस न्यूटन सूजा द्वारा स्थापित किए गए ‘द प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’, में शामिल हो गए। इस समूह में युवा कलाकारों को शामिल किया गया था, जो बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी परंपराओं को तोड़ना चाहते थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीयों को प्रोत्साहित करना चाहते थे।

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एम.एफ. हुसैन निश्चित रूप से दुनिया के सबसे प्रशंसित चित्रकारों में से एक रहे हैं और कला और पेंटिंग के क्षेत्र में दुनिया के नक्शे पर भारत को एक अलग पहचान दिलाने में कामयाब रहे। हुसैन को ‘पद्मश्री’ (1955), ‘पद्मभूषण’ (1973), ‘पद्म विभूषण’ (1991) से भी सम्मानित किया गया था।
हुसैन की पहली एकल प्रदर्शनी ज्यूरिख में प्रदर्शित हुई और अगले कुछ वर्षों में उनकी चित्रकारी यूरोप और अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हो गई। भारत सरकार ने हुसैन को 1955 में प्रतिष्ठित पदम श्री से सम्मानित किया और फोर्ब्स पत्रिका ने एम.एफ. हुसैन को “भारत का पिकासो” कहा है।

चित्रकार होने के अलावा, हुसैन एक फिल्म निर्माता भी थे उन्होंनेमीनाक्षीः अ टेल ऑफ थ्री सिटीजऔर थ्रू द आइस ऑफ ए पेंटर” जैसी कई प्रसंशित फिल्मों को भी बानाया है, इन फिल्मों ने इनको बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर अवार्ड का विजेता बना दिया। महंगी और समाज में संभ्रांत (एलीट) होने के बाद भी हुसैन की पेटिंग्स, स्केच्स (रेखाचित्र) और कला के लिए किये गये कार्य की काफी मांग रही।


विशेष योगदान उन्होंने रामायण, गीता, महाभारत आदि ग्रंथों में उल्लिखित सूक्ष्म पहलुओं को अपने चित्रों के माध्यम से जीवंत बनाया है।
भारत के सबसे प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकार एम.एफ. हुसैन का गुरुवार, 8 जून 2011 को लंदन में निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे। माना जाता है कि प्रसिद्ध चित्रकार को दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ने के कारण लंदन के रॉयल ब्रॉम्पटन अस्पताल में निधन हो गया। हिंदू देवताओं के विवादित चित्रों को बनाने के बाद उन्हें लोगों द्वारा धमकियाँ मिलीं, इसलिए हुसैन अपनी स्वेच्छा से लंदन और फिर दुबई में रहने के लिए चले गये थे।

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एम एफ हुसैन से जुड़ी कुछ यादें –


आज के इस जन्मदिन के मौके पर भूपेंद्र अस्थाना ने कुछ कलाकारों से बात चीत की जिस कड़ी में बनारस के मूर्तिकार श्री राजेश कुमार ने बात चीत के दौरान हुसैन से जुड़ी सुंदर आंखों देखी दृश्य का जिक्र किया। बताया कि हुसैन एक ऐसे सख्शियत का नाम है जिसे राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। भले ही लोग उनके पूरे नाम से वाकिफ नहीं हैं कुछ लोग एम एफ हुसैन या मक़बूल फिदा हुसैन के नाम से जानते हैं।

M F Husain
15 फरवरी 2003 को राज्य ललित कला अकादमी, लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुसैन का स्वागत और डेमोंस्ट्रेशन


हमे अच्छी तरह याद है लखनऊ राज्य ललित कला अकादमी ने उनके डेमोंस्ट्रेशन का कार्यक्रम किया था। मुख्य द्वार से गैलरी तक लाल कार्पेट कालीन बिछी थी। और उसपर नंगे पांव चलते हुए सभागार तक पहुचे तो खचाखच भरे सभागार में लोगों की निगाह हुसैन पर टिकी हुई थी। सभागार में रखे बड़े से कैनवास पर लम्बी सी कूची के माध्यम से काले रंग का प्रयोग किया और फिर प्राथमिक रंगों का प्रयोग किया और देखते देखते कैनवास पर एक घोड़े और स्त्री स्वरूप में आकृति उभर आया।

एक छात्र (शायद लखनऊ कला महाविद्यालय का )ने यह देख कर बोला यह मैं भी कर सकता हूँ। उसकी बातें मुझे गीली मिट्टी की तरह लगी क्योंकि उसे पता नहीं था कि कला क्या होती है। जिस साधना के बल पर इतने कम समय मे हुसैन ने सधी हुई रेखांकन किया शायद उसे पता नही की एक पका हुआ घड़ा कभी भी जल्दी अपना अस्तित्व नहीं खोता,लेकिन गीली मिट्टी का कोई वजूद नहीं होता उसे किसी भी शक्ल में ढाला जा सकता है उस छात्र की बातें मुझे ऐसी ही लगी। हुसैन ऐसे ही हुसैन नहीं हुए, उन पर बड़ी चर्चा हुई और चर्चा के दौरान जाना कि हुसैन को किस प्रकार प्रकृति से उनका लगाव था। नंगे पांव चलते थे और किन संघर्षों के साथ उन्होंने दुनिया के सामने अपने अंदर के कलाकार को स्थापित किया।


हुसैन ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी बैलगाड़ियों पर लगाई जिसके माध्यम से जनमानस के बीच उनकी कलाकृतियों को सहज रूप से देखी जाती थी फिर आगे चल कर देश विदेश में उनकी प्रदर्शनी बड़ी बड़ी गैलरियों में लगने लगी। दुनिया उन्हें एक चित्रकार के रूप में जानने लगी। हुसैन एक मुस्लिम चित्रकार थे , यह कहना उचित नहीं होगा वे एक कलाकार साधक थे क्योंकि उन्होंने चित्र कला को जिस प्रकार से अंगीकार किया, चित्रकला को इतनी ऊँचाई पर पहुचाया शायद ही कोई कलाकार ऐसा कार्य कर पाया हो। उनकी चित्र की इतनी शानी थी कि देश भर में उनका नाम हुआ और आज भी जब किसी नन्हे बच्चे को चित्र बनाते देखते हैं तो लोग कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि “हुसैन बनना है क्या ?” हुसैन एक जाना माना नाम है और कलाकारों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि हुसैन ने अपने पहचान कलाकार के रूप में बनाई।

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हुसैन साहब ने बनारस में रहकर बनारस पर अनेकों चित्र ,रेखांकन बनाएं। और अपने जानने, चाहने वालों को बहुत ही कम पैसों में उन कृतियों को दिये और लोग उसे महफूज रखें हैं और गर्व से बोलते भी हैं कि यह हुसैन साहब की कलाकृति है। यह एक बड़ी बात है।
हुसैन भारतीय चित्रकार थे बाद के दिनों में भले ही उन्होंने दूसरे देश की नागरिकता ली हो लेकिन भारतीयता और भारत उन्हें कभी अलग नहीं कर पायेगा। और न ही अलग समझता है। भारत के वर्तमान और भविष्य कलाकारों के बीच हुसैन हमेशा जीवित रहेंगे।

15 फरवरी 2003 में राज्य ललित कला अकादमी लखनऊ उत्तर प्रदेश में भी आये थे हुसैन

चित्रकार फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी के पहले प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए राज्य ललित कला अकादमी, लखनऊ में एम एफ हुसैन


इसी कड़ी में 15 फरवरी 2003 को जब राज्य ललित कला अकादमी लखनऊ में एम एफ हुसैन आये थे तो फणीन्द्र के चित्रों की प्रदर्शनी का अवलोकन भी हुसैन साहब ने किया था। यह पहली प्रदर्शनी थी फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी की। चित्रकार फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी जिन्होंने लखनऊ कला महाविद्यालय से कला शिक्षा ग्रहण की है। और वर्तमान में एक स्वतंत्र चित्रकार के रूप में स्थापित हैं।


अखिलेश निगम (वरिष्ठ चित्रकार, कला समीक्षक) बताते हैं कि बहुचर्चित और साथ ही विवादित रहे हुसैन साहब का आज जन्मदिन है, शुभकामनाएं, बधाई. वे पण्डरपुर में सन् 1915 में जन्में थे और एम एफ हुसैन नाम से अधिक जाने- पहचाने जाते थे। उनकी कला, लघु फिल्म आदि आदि के बारे में बहुत चर्चे रहे हैंपर पता नहीं क्यों मुझे उनमें एक” जर्नलिस्ट आर्टिस्ट ” ज्यादा दिखता था। उनकी- हमारी मुलाकातें ज्यादा तो न थीं फिर भी हम लखनऊ, दिल्ली और मुंबई में कई बार मिले थे. उनके व्यक्तित्व में एक आकर्षण था या यूं कहिए कि वे आकर्षण पैदा करने में माहिर थे. मैं उनसे अपनी उस मुलाकात को ज्यादा खास मानता हूं जब वे दिल्ली स्थित ललित कला अकादमी की वीथिका में दर्शक बन कर मेरे “प्रिंटाज़ ” शैली के चित्रों की एकल प्रदर्शनी आये थे। उस दिन भी संयोग से 17 तारीख थी मगर महीना सन्1980 के अक्तूबर का था. उसदिन हमारी चर्चा भी हुई थी, और”दर्शक- पुस्तिका ” में हिन्दी और अंग्रेज़ी में हस्ताक्षर भी किये थे – “हुसैन”।

  • भूपेंद्र कुमार अस्थाना
    17/9/2020

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